स्वतंत्र पत्रकारिता में डिजिटल प्लेटफॉर्म निभा रहे हैं निर्णायक भूमिका

आमिर रिज़वी
3 मई विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर विशेष

विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस आज ऐसे समय में मनाया जा रहा है जब सूचना का विस्तार अभूतपूर्व है, लेकिन उसकी स्वतंत्रता और विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न भी खड़े हो रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1993 में, यूनेस्को के 1991 के 26वें महासभा सम्मेलन में पारित सिफारिश के आधार पर इस दिवस की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता के मूलभूत सिद्धांतों को मान्यता देना और वैश्विक स्तर पर इसकी स्थिति का मूल्यांकन करना है। “शांतिपूर्ण भविष्य का निर्माण” जैसे इस वर्ष के विषय के संदर्भ में यह सवाल और भी अहम हो जाता है कि क्या आज की पत्रकारिता वास्तव में स्वतंत्र है।

वैश्विक स्तर पर पत्रकारों की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। सऊदी अरब के पत्रकार जमाल खाशोगी की हत्या ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया था और यह दिखाया कि सत्ता के खिलाफ सच बोलना कितना जोखिम भरा हो सकता है। इसी तरह इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष के दौरान शिरीन अबू अकलेह की मौत ने युद्ध क्षेत्रों में पत्रकारों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए। ये घटनाएं इस बात का प्रतीक हैं कि प्रेस की स्वतंत्रता केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि एक निरंतर संघर्ष है।

आज ईरान, अमेरिका सहित कई देशों में मीडिया पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दबाव देखने को मिलता है। कहीं सेंसरशिप है, तो कहीं वैचारिक ध्रुवीकरण। इस बीच तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने पत्रकारिता को नई दिशा दी है। खबरें अब तेजी से फैलती हैं, लेकिन फेक न्यूज़, डीपफेक और भ्रामक सूचनाओं का खतरा भी उतनी ही तेजी से बढ़ा है। ऐसे में पत्रकारों की जिम्मेदारी पहले से अधिक बढ़ गई है।

भारत में पत्रकारिता का परिदृश्य भी इसी द्वंद्व को दर्शाता है। एक ओर मुख्यधारा के बड़े चैनल और अखबार हैं, जिन पर अक्सर कॉर्पोरेट प्रभाव और सरकारी झुकाव के आरोप लगते हैं। विज्ञापन आधारित मॉडल के चलते कई मीडिया संस्थानों पर यह दबाव रहता है कि वे सत्ता के खिलाफ तीखे सवाल उठाने से बचें। परिणामस्वरूप, कई बार पत्रकारिता का स्वर आलोचनात्मक कम और अनुकूल अधिक दिखाई देता है।

लेकिन इसी परिदृश्य में डिजिटल पत्रकारिता एक नए विकल्प के रूप में उभर कर सामने आई है। YouTube, स्वतंत्र न्यूज पोर्टल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने पत्रकारों को एक नया मंच दिया है, जहां वे बिना बड़े कॉर्पोरेट दबाव के अपनी बात रख सकते हैं। कई ऐसे पत्रकार, जो कभी मुख्यधारा मीडिया के प्रमुख चेहरे थे, अब स्वतंत्र रूप से काम करते हुए निष्पक्ष और जमीनी रिपोर्टिंग कर रहे हैं।

हालांकि, डिजिटल प्लेटफॉर्म भी पूरी तरह चुनौतियों से मुक्त नहीं हैं। यहां भी एल्गोरिदम, ट्रोलिंग, फंडिंग और विश्वसनीयता के सवाल मौजूद हैं। फिर भी, यह कहना गलत नहीं होगा कि डिजिटल मीडिया ने स्वतंत्र पत्रकारिता को एक नई ऊर्जा और दिशा दी है। इसने दर्शकों को विकल्प दिया है और सूचना के एकाधिकार को तोड़ा है।

अंततः, विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस हमें यह याद दिलाता है कि एक सशक्त लोकतंत्र के लिए स्वतंत्र और जिम्मेदार पत्रकारिता अनिवार्य है। चाहे वह पारंपरिक मीडिया हो या डिजिटल प्लेटफॉर्म—सच्चाई, निष्पक्षता और जनहित ही पत्रकारिता की असली पहचान होनी चाहिए। तभी हम एक जागरूक समाज और वास्तव में शांतिपूर्ण भविष्य की ओर बढ़ सकते हैं।

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